काव्य पल्लव

जीवन के आपाधापी से कुछ समय निकाल कर कल्पना के मुक्त आकाश में विचरण करते हुए कुछ क्षण समर्पित काव्य संसार को। यहाँ पढें प्रसिद्ध हिन्दी काव्य रचनाऐं एवं साथ में हम नव रचनाकारों का कुछ टूटा-फूटा प्रयास भी।
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Friday, 29 August 2008

किसे सुनाऊँ अपने गीत- करण समस्तीपुरी

(सौजन्य- हिन्द-युग्म)
प्रस्तुत है "काव्य पल्लव" के मुख्य रचनाकार "युनि कवि" श्री केशव कर्ण "करण समस्तीपुरी" की एक पुरस्कृत रचना।
हिन्द-युग्म के जनवरी २००८ के यूनिकवि केशव कुमार कर्ण ने मई माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में आठवाँ स्थान बनाया। आप भी देखिए आखिर यह कमाल कैसे हुआ? - कुन्दन कुमार मल्लिक
पुरस्कृत कविता- किसे सुनाऊँ अपने

तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत!!
वह मधुमय संसार सुहाना,
वह स्वर्णिम शैशव का हास!
सह-क्रीड़ा, साहचर्य हमारा,
बन कर रहा शुष्क इतिहास!!
क्या ये आँख मिचौनी ही है,
जरा बता बचपन के मीत!
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत !!

कोतूहल कलरव पीपल तल,
बृहद् विटप का शीतल छाँव!
तटिनी तट फैला सिकतांचल,
स्नेह-सुधानिधि सुंदर गांव!
पगडण्डी पर आँख बिछाए,
गए कई निशि-वाषर बीत!
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत !!

अश्रु शेष केवल आंखों में,
सपने तक नहीं आते हैं!
उस पीड़ा को क्या जानो तुम,
जब अपने छोड़ के जाते हैं!
याद तुम्हीं को करना प्रतिपल,
मेरे जर-जीवन की रीत!
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिये,
किसे सुनाऊं अपने गीत!!

Tuesday, 26 August 2008

स्मृति शिखर से- करण समस्तीपुरी

- केशव कर्ण "करण समस्तीपुरी"

स्मृति शिखर से चला प्रखर,
वह मधुर पवन, वह मुखर पवन,
उर सिहर गया क्षण ठहर गया,
और अतीत बना दर्पण,
स्मृति शिखर से चला प्रखर,
वह मधुर पवन, वह मुखर पवन।

कर यत्न दिया विश्राम इसे,
पीड़ा उर की बतलाऊं किसे,
यह काल आवरण ओढ़ परी,
स्मरण पटल में जा गहरी,
पर पुनः पवन से पा जीवन,
फिर जाग उठी यादों की अगन,
स्मृति शिखर से चला प्रखर,
वह मधुर पवन, वह मुखर पवन।

नीरव नीर में शांत शिथिल,
दृग में अतीत का स्वप्न लिए,
किस्मत को कौन बदल सकता,
क्या मिला बहुत प्रयत्न किए,
जगा गयी स्मरण विहग को,
अरुणोदय की तीक्ष्ण किरण,
स्मृति शिखर से चला प्रखर,
वह मधुर पवन, वह मुखर पवन।

अकुला कर दीन विहग बोला,
अलसाई निज पलकें खोला,
सुदीर्घ रात का प्रात जान,
खग उड़ा नीड़ से पंख तान,
पंक्षी पर अंकुश कौन रखे,
पा गया निमिष में दूर गगन,
स्मृति शिखर से चला प्रखर,
वह मधुर पवन, वह मुखर पवन।

अम्बर का अंत कहाँ पावे,
बीते हुए कलह कैसे आवे,
आ गया गगनचर फिर थक के,
आशा फिर मिलने की रख के,
उर धीर भरा, सुर पीर भरा,
हो गाने लगा वह मस्त मगन,
स्मृति शिखर से चला प्रखर,
वह मधुर पवन, वह मुखर पवन।

- केशव कर्ण "करण समस्तीपुरी"
बेंगलुरु, सम्पर्क- +९१- ९७४०० ११४६४,
ई-मेल-
keshav.karna@gmail.com