काव्य पल्लव

जीवन के आपाधापी से कुछ समय निकाल कर कल्पना के मुक्त आकाश में विचरण करते हुए कुछ क्षण समर्पित काव्य संसार को। यहाँ पढें प्रसिद्ध हिन्दी काव्य रचनाऐं एवं साथ में हम नव रचनाकारों का कुछ टूटा-फूटा प्रयास भी।
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Thursday, 19 April 2012

गाँव की भोर

भोर की बेला
खिड़की से छन छन कर आती धूप
चिड़ियों की वो चहचाहट
गलियों में बच्चों का शोर
आज अरसे बाद
जब जल्दी उठा तो जाना
गाँव की सुबह आज भी उतनी ही खूबसूरत है!!

Tuesday, 17 April 2012

मित्र तुम्हारे लिए

[मित्र तुम्हारे प्रीत्यर्थ उत्सर्गित, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए- कुन्दन कुमार मल्लिक नहीं, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा कन्नू ]


कल बात कर रहा था
कुछ रंगों की
जिनमें परिलक्षित होते हैं
जीवन के कई रुप
वो रंग
जिनमें हैं कुछ स्याह भी
और कुछ सफेद भी
या फिर दृष्टिभ्रम कराते हुए
कुछ धूसर भी
लेकिन उन रुपों का क्या
जिनका कोई रंग नहीं
ऐसे ही तो कुछ सम्बन्ध भी हैं
जिनका कोई रंग नहीं
रुप नहीं और
ना नाम ही
वो सम्बन्ध
जो केवल मानवीय नहीं
वरन् आत्मीय मात्र हैं
जो यदा-कदा ही दिखते हैं
इन खुली आंखों से
फिर भी भान कराते
हमेशा अपने होने का
जिनका वजूद सीमित नहीं
सिर्फ दैहिक उपस्थिति तक
कुछ ऐसा ही रंग है
और यही रुप भी
मित्र तुम्हारे होने का
जिनका होना मात्र
हमेशा एक सम्बल रहा है
जीवन के हर उन क्षणों में
हर उन पीड़ाओं में
जिसे ना हम बाँट सकते
ना ही दिखा सकते
जिसे देखा है
केवल हमदोनों ने
जहाँ हमेशा गौण रहा
हमारा होना या न होना
कौन कह सकता है
हमारे इस दशक पुराने
सम्बन्ध मे
हमरा मिलना नगण्य रहा
मित्र आज धन्य हूँ
तुम्हारे साथ
रंग, रुप और नाम रहित
इस सम्बन्ध को पाकर ।

Friday, 13 April 2012

रंग

- कुन्दन कुमार मल्लिक

रंग
जो दिखाते हैं
जीवन के कई रुप
कहीं स्याह तो कहीं सफेद
जो स्पष्ट नजर आते हैं
लेकिन उन रंगों का क्या
जो धूसर हैं
इन रंगों से एकदम परे
जिनके होने के कई मायने हैं
जो दिगभ्रमित करते हैं
कल की ही तो बात है
वो एक अधेड़ सा चेहरा
जो अचानक सा सामने आ गया
बस से उतरते ही
कहने लगा
बाबूजी दो रुपये दे दो
उसे अनसुना कर
पाँच रुपये की पान गालों में दबा
आगे निकल गया
कुछ दूर बाद
फिर वही चेहरा दिखा
चलने में अशक्त
कुछ बेजार सा
शायद उसके पास
कम पड़ गये होंगे
ऑटो के लिए दो रुपये

मैं खड़ा सोचता रहा
ये वही धूसर रंग थे
जो मुझे दिगभ्रमित कर गए ।